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बिहार की वर्तमान सियासत का चेहरा तो उपेंद्र कुशवाहा ही हैं, घटक दलों को याद रखना होगा

बिहार की सियासत में भूचाल मचा हुआ है. बयानों की बरसात है और चर्चा कें केंद्र में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा हैं. करीब पांच साल पहले उपेंद्र कुशवाहा की अगुआई में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) का गठन हुआ था और साल भर बाद ही उसने लोकसभा चुनाव में तीन सीटें जीत कर नया इतिहास रचा था. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने के साथ ही नीतीश कुमार और भाजपा का याराना टूटा. बिहार में भाजपा तब अकेले खड़ी थी. उसके साथ अछूतों की तरह व्यवहार किया जा रहा था. गठबंधन के लिए भाजपा को साथियों की तलाश थी.

लेकिन बिहार में उसे साथी मिल नहीं रहे थे. तब उपेंद्र कुशवाहा आगे आए और रालोसपा ने भाजपा का हाथ बिहार में थामा. बाद में रामविलास पासवान आए. नहीं तो वे तो अंतिम समय तक कांग्रेस के सिग्नल का इंतजार करते रहे थे. उपेंद्र कुशवाहा आगे आए तो भाजपा ने राहत की सांस ली. हालांकि तब भी रालोसपा ने भाजपा को बड़े सहयोगी के तौर पर लिया. इसका नतीजा लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला. एनडीए बिहार में चालीस में से 31 सीटें जीत ले गया.

सीटों का बंटवारा हुआ तो रालोसपा के खाते में तीन सीटें आईं. हालांकि भाजपा ने तब भी दिल बड़ा नहीं किया था. रोलासपा ने तीनों सीटें जीत कर नीतीश कुमार के दल को पीछे छोड़ दिया. साल भर पहले वजूद में आई रालोसपा ने बरसों से बिहार की सियासत में पैठ बना चुकी जेडीयू को पीछे छोड़ा. जेडीयू के दो ही सांसद चुने गए थे. तब नीतीश कुमार ने अकेला चुनाव लड़ा था और उपेंद्र कुशवाहा के चेहरे के आगे उनके चेहरे की चमक फीकी पड़ गई थी. बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल में उपेंद्र कुशवाहा को जगह मिली. भाजपा ने यहां भी तंगदिली ही दिखाई और उन्हें राज्यमंत्री ही बनाया. लेकिन सहयोगी होने के नाते कुशवाहा खामोश रहे. लेकिन अपने कामकाज से कुशवाहा ने बिहार की सियासत में कई चेहरों की चमक फीकी कर दी. उनमें नीतीश कुमार का चेहरा भी था.

आज वह चमक और फीकी पड़ी है. भले नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन बिहार की सियासत में उनका कद अब पहले जैसा नहीं रहा है. उपेंद्र कुशवाहा उनसे आगे निकल गए हैं. जनता दल यूनाइटेड के तमाम नेता जिन नीतीश कुमार के चेहरे की दुहाई दे रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में सियासत की अलग बयार बह रही है, उस बयार में नीतीश का चेहरा नहीं उपेंद्र कुशवाहा का चेहरा ही चमक रहा है.

नीतीश कुमार ने जिस तरह से बिहार की सियासत में कलाबाजी खाई है, उससे उनकी हैसयित भी कम हुई और विश्वसनीयता भी. विश्वसनीयता के इसी संकट से जूझ रहे हैं नीतीश कुमार और इसी वजह से हर तिकड़म का इस्तेमाल सत्ता में बने रहने के लिए कर रहे हैं. लेकिन लालू यादव का साथ छोड़ कर जिस तरह से भाजपा की गोद में वे आ बैठे हैं, उस वजह से न तो उसके अपने उन पर यकीन करने को तैयार हैं और न ही बेगाने उन्हें अपने साथ लेने को तैयार. यानी फिलहाल वे बिहार की सियासत में अछूत हो गए हैं. ठीक है कि वे मुख्यमंत्री हैं. जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष भी हैं. लेकिन सच यह भी है कि नीतीश कुमार एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं. भाजपा पर दबाव बनाने के लिए ही उन्होंने आनन-फानन में अपने नेताओं के जरिए अपने को बड़े भाई के तौर पर प्रोजेक्ट कर डाला. लेकिन सच यह है कि आज बिहार में उनके चेहरे पर राजग चुनाव लड़ता है तो उसे फायदा कम नुकसान ही ज्यादा होगा.

राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने पिछले कुछ सालों में बिहार में जमीनी स्तर पर जिस तरह से पहचान बनाई है, उससे पार्टी की पैठ तो बनी ही है उपेंद्र कुशवाहा का चेहरा भी निर्विवाद रहा है. रालोपसा के कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि ने तो साफ भी कर दिया है कि बिहार के वर्तमान सियासी माहौल में उपेंद्र कुशवाहा से बड़ा चेहरा न तो भाजपा के पास है और न ही जेडीयू के पास. जातीय गणित भी कुशवाहा के पक्ष में है. नागमणि इसी आधार पर कहते हैं कि कुशवाहा को मुख्यमंत्री के तौर पर सामने रख कर एनडीए चुनाव लड़े. इसमें गलत भी नहीं है. रालोसपा ने हाल के दिनों में शिक्षा और सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में कोलजियम प्रणाली के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है.

बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ लगातार पार्टी सक्रिय रही. इससे उसे फायदा भी हुआ. पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शंकर झा आजाद कहते हैं कि रालोसपा पहली पार्टी है जिसने शिक्षा के सवाल पर आंदोलन किया. शंकर झा का कहना है कि हाल के दिनों में हमारा विस्तार हुआ है और उपेंद्र कुशवाहा पर लोगों का यकीन बढ़ा है. बड़ी बात यह है कि कुशवाहा ने जातीय बंदिशों को भी तोड़ा है. पटना में एनडीए के भोज और सुशील कुमार मोदी के इफ्तार पार्टी में कुशवाहा के शामिल नहीं होने के सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं. निकाले जाने भी चाहिए. लेकिन राजग को इस सच को भी स्वीकार करना चाहिए कि बिहार की वर्तमान सियासी माहौल में उपेंद्र कुशवाहा से बड़ा चेहरा कोई दूसरा नहीं है. इस सच को वह जितनी जल्दी स्वीकार कर लेगा, उसके लिए उतना ही अच्छा है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेषण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).

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