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पद्मावती विवादः फिल्में इतिहास नहीं बाजार का हिस्सा होती हैं

कोई चार-पांच साल पहले की बात है। कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ रिलीज को तैयार थी। लेकिन रिलीज से पहले फिलम को लेकर विवाद उठा। कुछ मुसलिम संगठनों ने फिल्म के कुछ दृश्यों के साथ-साथ इसके कुछ संवाद को लेकर एतराज जताया और फिर बड़े पैमाने पर फिल्म का विरोध शुरू हुआ। दिलचस्प बात यह थी कि फिल्म का विरोध करने वालों ने तब फिल्म देखी भी नहीं थी। लेकिन धार्मिक भावनाएं भड़काने का सवाल उठा। बात किसी एक ने की और फिर यह जा वोह जा। बात जंगल की आग बन गई। एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे तक फैली और फिर पूरे देश में। मुसलमानों में फिल्म को लेकर गुस्सा पनपा। किसी ने कुछ कहा किसी ने कुछ। फिल्म पर बहस छिड़ गई। चैनलों ने पैनल बैठाए और दूसरी खबरें गौण हो गईं और ‘विश्वरूपम’ और कमल हासन ही चर्चा के केंद्र में रहे।

तब किसी चैनल पर चर्चा में एक मुफ्ती साहब भी हिस्सा ले रहे थे। मुफ्ती साहब ने इस्लाम के हवाले से फिल्म पर बात शुरू की और कमल हासन पर मुसलमानों की दिलआजारी की बात कही। मुफ्ती साहब ने यह भी कहा था कि फिल्म वाले मुसलमानों की छवि बिगाड़ रहे हैं और उन्हें आतंकवादी, डॉन या इसी तरह के नेगेटिव भूमिका में पेश कर रहे हैं। चर्चा में मैं भी शामिल था। मुफ्ती साहब चुप हुए तो मैंने उनसे पूछा था, अभी फिल्म रिलीज नहीं हुई तो आपने फिल्म कहां देखी और बिना फिल्म देखे आप किस आधार पर कह रहे हैं कि फिल्म इस्लाम के खिलाफ है।

मुफ्ती साहब के पास कोई जवाब नहीं था। उनसे यह भी मैंने कहा कि फिल्म किसी इतिहास-भुगोल पर नहीं बनाई जाती। समाज की विसंगतियों को फिल्म हमारे सामने जरूर लाती है लेकिन फिल्म बाजार के गुणा और भाग को देख कर बनाई जाती है। आतंकवाद का मसला पूरे विश्व में है। पाकिस्तान भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है तो जाहिर है कि फिल्म में अगर आतंकवादियों का चित्रण किया जाएगा तो वे किरदार मुसलमान ही होंगे। लेकिन मुसलमानों की छवि फिल्मों में सिर्फ नेगेटिव ही दिखाई जाती रही है, ऐसी बातें नहीं हैं। तब ‘जंजीर’ और ‘शोले’ सहित दर्जनों फिल्म के नाम गिनवा दिए थे। इस्लाम के हवाले से ही कई सवाल मुफ्ती साहब से किए थे। पूछा था कि मजहब फिल्म देखने की इजाजत देता है क्या। मुफ्ती साहब के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। बहस की धारा तब बाजार की धारा की तरफ मुड़ गई थी।

फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर भी ऐसा ही कहा जा सकता है। विवाद के लिए विवाद खड़ा करना देश में आम बात हो गई है। फिर मीडिया जिस तरह से ऐसे लोगों को महिमामंडित करने लगा है, इसके बाद तो सब कुछ सियासत का हिस्सा हो जाता है। तरह-तरह के बयान दिए जाने लगते हैं और मुद्दे को धार्मिक अस्मिता और आत्म-सम्मान सो जोड़ दिया जाता है। पद्मावती फिल्म किसी ने नहीं देखी है अब तक लेकिन राजपूत रानी के सम्मान से खिलवाड़ करने का मुद्दा उछाल कर फिल्म के निर्देशक से लेकर अभिनेत्री तक को धमकाया गया। उनके सर काटने पर ईनाम रखे गए और न जाने क्या-क्या कहा गया। संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी फिल्म की स सियासत में कूदे और इसे अपने-अपने तरीके से इसे परिभाषित किया। जितना बवाल मचाना था लोगों ने मचाया। लेकिन ऐसा करते हुए सब भूल गए कि फिल्में इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं हैं।

फिल्में बाजार को ध्यान में रख कर बनाई जातीं हैं। एक दौर थास, समानांतर सिनेमा का। तब फिल्में सामाजिक सरोकारों के लिए बनाई जातीं थीं। फिल्म बाजार में चले या नहीं, इसकी फिक्र फिल्मकारों को नहीं थी। नसीर उद्दीन शाह से लेकर ओमपुरी और शबाना आजमी उसी धारा से निकले लेकिन धीरे-धीरे ये तमाम कलाकार व्यवसायिक धारे से जुड़ गए। वह धारा अब लगभग खत्म हो गई है। फिल्में अब बाजार का हिस्सा हैं। फिल्म ‘पद्मावती’ में राजपूत संगठनों ने रानी के किरदार को गलत तरीके से दिखाने की बात तो कही ही फिल्म में दीपिका पादुकोण के नृत्य करने पर भी एतराज जताया। लेकिन ऐसा करने वाले उन धार्मिक धारावाहिकों पर एतराज क्यों नही जताते, जिनमें देवी-देवताओं के चरित्र को उस तरह नही दिखाया जाता है, जिस तरह उनके चरित्र धर्मग्रंथों में हैं। तो सवाल बस इतना है कि फिल्में हमारे लिए जीवन का साधन है या मनोरंजन का।

फिल्में जिंदगी का हिस्सा होते हुए भी जिंदगी का हिस्सा नहीं हो सकतीं। उन्हें गंभीरता से लिया भी नहीं जाना चाहिए। फिल्म हम मनोरंजन के लिए देखते हैं। उसे इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। सही है कि फिल्में हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं लेकिन यह प्रभाव सड़कों पर दिखाई दे। यह गलत है। फिल्मों के अंदर और फिल्मों के बाहर की दुनिया बहुत अलग है। इसे अलग-अलग कर के ही देखा जाना चाहिए। नहीं तो सड़क से लेकर संसद तक संग्राम होता रहेगा। फिल्म बनाने के बाद लोग सड़कों पर उतरते रहेंगे और सेंसर बोर्ड से अलग एक समानांतर व्यवस्था खड़ी हो जाएगी। जो यकीनन ठीक नहीं होगी। सिनेमा अलग है और सियासत अलग। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग सियासत को गंभीरता से नहीं लेते हैं, सिनेमा को ज्यादा संजीदगी से देखने लग जाते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। सिनेमा खालिल मनोरंजन है, खालिस व्यवसाय है। फिल्में इतिहास नहीं बाजार का हिस्सा हैं। इसे इसी तरह से देखें।

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